अध्याय 2: वर्ण विचार (Phonology) – संपूर्ण अध्ययन
हिंदी व्याकरण के प्रथम अंग को ‘वर्ण विचार’ कहा जाता है। किसी भी भाषा को सीखने के लिए उसकी मूल ध्वनियों को समझना अनिवार्य है। वर्ण विचार के अंतर्गत हम वर्णों के आकार, उनके उच्चारण, उनके भेद और उनके मेल से शब्द बनाने के नियमों का विस्तार से अध्ययन करते हैं।
1. वर्ण की परिभाषा और स्वरूप
भाषा की वह सबसे छोटी इकाई जिसके और अधिक टुकड़े या खंड नहीं किए जा सकते, उसे वर्ण कहते हैं। वर्ण को ‘अक्षर’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है जिसका क्षय (नाश) न हो।
‘आम’ शब्द दो वर्णों के मेल से बना है: आ + म् + अ।
यहाँ ‘आ’, ‘म्’ और ‘अ’ वर्ण हैं क्योंकि इनके और अधिक छोटे हिस्से नहीं हो सकते।
2. वर्णमाला (Alphabet)
किसी भी भाषा के वर्णों के व्यवस्थित और क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी वर्णमाला देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसमें कुल 52 वर्ण होते हैं (मानक गणना के अनुसार)।
3. वर्ण के भेद
उच्चारण और प्रकृति के आधार पर हिंदी वर्णमाला को दो मुख्य भागों में बांटा गया है:
(क) स्वर (Vowels)
जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के स्वतंत्र रूप से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। हिंदी में मुख्य रूप से 11 स्वर होते हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
स्वरों के प्रकार:
- ह्रस्व स्वर: जिनके उच्चारण में बहुत कम समय लगता है (अ, इ, उ, ऋ)।
- दीर्घ स्वर: जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दुगुना समय लगता है (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ)।
- प्लुत स्वर: जिनके उच्चारण में तीन गुना समय लगे, जैसे ‘ओ३म’।
(ख) व्यंजन (Consonants)
जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक व्यंजन में ‘अ’ की ध्वनि छिपी होती है।
व्यंजनों का वर्गीकरण:
- स्पर्श व्यंजन: क-वर्ग से म-वर्ग तक (कुल 25 व्यंजन)।
- अंतस्थ व्यंजन: य, र, ल, व (कुल 4 व्यंजन)।
- ऊष्म व्यंजन: श, ष, स, ह (कुल 4 व्यंजन)।
- संयुक्त व्यंजन: क्ष, त्र, ज्ञ, श्र (दो व्यंजनों के मेल से बने)।
4. उच्चारण स्थान (Place of Articulation)
मुख के जिस भाग से जो वर्ण बोला जाता है, वह उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहलाता है। इसे समझना शुद्ध वर्तनी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
| वर्ग | उच्चारण स्थान | वर्ण |
|---|---|---|
| कंठ्य | गला (कंठ) | अ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह |
| तालव्य | तालु | इ, ई, च, छ, ज, झ, ञ, य, श |
| मूर्धन्य | मूर्धा (कठोर तालु) | ऋ, ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष |
| दंत्य | दांत | त, थ, द, ध, न, ल, स |
| ओष्ठ्य | होंठ | उ, ऊ, प, फ, ब, भ, म |
5. अल्पप्राण और महाप्राण
सांस की मात्रा (वायु) के आधार पर व्यंजनों के दो भेद हैं:
- अल्पप्राण: जिनके उच्चारण में वायु कम मात्रा में बाहर निकलती है (वर्ग का 1, 3, 5वां वर्ण)।
- महाप्राण: जिनके उच्चारण में वायु अधिक मात्रा में और ‘ह’ जैसी ध्वनि के साथ निकलती है (वर्ग का 2, 4वां वर्ण)।
6. घोष और अघोष वर्ण
स्वरतंत्रियों में कंपन के आधार पर:
- अघोष: जिनके उच्चारण में कंपन नहीं होता (वर्ग का 1, 2वां वर्ण)।
- सघोष (घोष): जिनके उच्चारण में कंपन होता है (वर्ग का 3, 4, 5वां वर्ण और सभी स्वर)।
महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (अभ्यास कार्य)
उत्तर: सामान्य बोलचाल में वर्ण और अक्षर को एक ही माना जाता है, परंतु व्याकरणिक दृष्टि से इनमें सूक्ष्म अंतर है। ‘वर्ण’ भाषा की वह मूल ध्वनि है जिसके टुकड़े नहीं हो सकते (जैसे- क्, म्, अ, इ)। ‘अक्षर’ वह ध्वनि या ध्वनि समूह है जिसका उच्चारण श्वास के एक झटके में हो जाता है। उदाहरण के लिए, ‘राम’ शब्द में वर्ण चार हैं (र + आ + म + अ), लेकिन अक्षर दो ही हैं (रा + म)। अक्षर में स्वर का होना अनिवार्य है, जबकि वर्ण स्वर-रहित भी हो सकता है।
उत्तर: जब दो अलग-अलग व्यंजन आपस में मिलते हैं और एक नया रूप धारण कर लेते हैं, तो उन्हें संयुक्त व्यंजन कहा जाता है। हिंदी में मुख्य चार संयुक्त व्यंजन हैं:
1. क्ष: क् + ष + अ (उदाहरण: कक्षा, क्षमा)
2. त्र: त् + र + अ (उदाहरण: पत्र, त्रिशूल)
3. ज्ञ: ज् + ञ + अ (उदाहरण: ज्ञान, विज्ञान)
4. श्र: श् + र + अ (उदाहरण: श्री, श्रम)
उत्तर: अनुस्वार का उच्चारण केवल नाक से होता है और यह वर्ण के ऊपर बिंदु के रूप में लगाया जाता है (जैसे: गंगा, चंचल)। यह पंचम वर्ण के स्थान पर आता है। अनुनासिक (चंद्रबिंदु) का उच्चारण नाक और मुख दोनों से होता है (जैसे: चाँद, आँख, गाँव)। यदि शिरोरेखा के ऊपर मात्रा लगी हो, तो स्थान की कमी के कारण चंद्रबिंदु की जगह बिंदु लगाया जाता है, लेकिन उसका उच्चारण अनुनासिक ही रहता है (जैसे: में, कहीं)।
उत्तर: ‘ऋ’ मूलतः संस्कृत का स्वर है और हिंदी वर्णमाला में इसे स्वरों की श्रेणी में ही रखा गया है। इसका प्रयोग केवल तत्सम (संस्कृत से आए) शब्दों में होता है जैसे- ऋषि, ऋतु, ऋण। आधुनिक हिंदी में इसका उच्चारण ‘रि’ (व्यंजन र + स्वर इ) की तरह होने लगा है, इसी कारण कई लोग इसे व्यंजन समझने की भूल करते हैं, परंतु व्याकरणिक रूप से यह आज भी स्वर है।
उत्तर: जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय जीभ मुख के विभिन्न भागों (कंठ, तालु, मूर्धा, दांत, ओष्ठ) को स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। इन्हें 5 वर्गों में बांटा गया है:
1. क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ)
2. च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ)
3. ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण)
4. त-वर्ग (त, थ, d, ध, न)
5. प-वर्ग (प, फ, ब, भ, म)
उत्तर: जब एक ही व्यंजन ध्वनि दो बार लगातार आए (एक बार स्वर रहित और दूसरी बार स्वर सहित), तो उसे द्वित्व व्यंजन कहते हैं। इसमें पहला व्यंजन आधा और दूसरा पूरा होता है।
उदाहरण:
– क् + क = क्क (पक्का, चक्का)
– च् + च = च्च (बच्चा, कच्चा)
– ट् + ट = ट्ट (खट्टा, लट्टू)
– ल् + ल = ल्ल (बिल्ली, दिल्ली)
उत्तर: अंतस्थ व्यंजन (य, र, ल, व): इनके उच्चारण में जीभ मुख के किसी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती। ये स्वर और व्यंजन के मध्य की स्थिति में होते हैं।
ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह): इनके उच्चारण में मुख से वायु रगड़ खाकर निकलती है जिससे ऊष्मा (गर्मी) पैदा होती है। इन्हें बोलते समय एक प्रकार की सीटी जैसी ध्वनि या घर्षण महसूस होता है।
उत्तर: किसी शब्द के प्रत्येक वर्ण को अलग-अलग करके लिखना ‘वर्ण विच्छेद’ कहलाता है। इससे शब्द की बनावट और वर्तनी का सही ज्ञान होता है।
प्रशिक्षण: प् + र + अ + श् + इ + क् + ष + अ + ण + अ।
उत्तर: ‘ड़’ और ‘ढ़’ को उत्क्षिप्त या विकसित व्यंजन कहा जाता है। ये ट-वर्ग के ‘ड’ और ‘ढ’ के नीचे बिंदु (नुक्ता) लगाकर बनाए गए हैं। इनकी मुख्य विशेषता यह है कि इनसे कभी भी किसी शब्द की शुरुआत नहीं होती। ये हमेशा शब्द के बीच में या अंत में आते हैं (जैसे: सड़क, पढ़ना, चढ़ना)। जबकि ‘ड’ और ‘ढ’ से शब्द शुरू हो सकते हैं (जैसे: डमरू, ढोलक)।
उत्तर: अघोष वर्ण: प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण (क, ख, च, छ…) तथा श, ष, स अघोष हैं। इनके उच्चारण में गूँज पैदा नहीं होती।
घोष/सघोष वर्ण: प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पांचवां वर्ण (ग, घ, ङ, ज, झ, ञ…) तथा सभी स्वर, य, र, ल, व, ह घोष हैं। इनके उच्चारण में स्वर तंत्रियों में कंपन और गूँज उत्पन्न होती है।
उत्तर: जब किसी व्यंजन का प्रयोग स्वर के बिना करना हो, तो उसके नीचे एक तिरछी रेखा लगाई जाती है जिसे हलंत कहते हैं। व्यंजन अपने आप में अधूरे होते हैं, उन्हें बोलने के लिए ‘अ’ स्वर की आवश्यकता होती है। यदि हम केवल शुद्ध व्यंजन दिखाना चाहते हैं, तो हलंत का प्रयोग अनिवार्य है (जैसे: महान्, विद्वान्, पाठ्य)।
उत्तर: विसर्ग का उच्चारण स्वर के बाद आधे ‘ह’ की तरह किया जाता है। इसका चिन्ह (ः) है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से संस्कृत के तत्सम शब्दों में होता है। उदाहरण: प्रातः (प्रात-ह), अतः (अत-ह), स्वतः, दुःख आदि। हिंदी की तद्भव शब्दावली में विसर्ग का लोप हो जाता है।
उत्तर: जब स्वरों का प्रयोग व्यंजनों के साथ मिलाकर किया जाता है, तो उनका रूप बदल जाता है। स्वरों के इसी बदले हुए रूप को ‘मात्रा’ कहते हैं। ‘अ’ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती, वह प्रत्येक व्यंजन में समाहित होता है। अन्य स्वरों (आ, इ, ई आदि) के लिए निश्चित चिन्ह हैं। जैसे- क + आ = का, क + इ = कि।
उत्तर: अयोगवाह (अनुस्वार और विसर्ग) को वर्णमाला में स्वरों के ठीक बाद और व्यंजनों से ठीक पहले रखा जाता है। चूँकि इनका उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना संभव नहीं है, इसलिए ये व्यंजनों के निकट हैं, परंतु इनके चिन्ह स्वरों की तरह मात्राओं के रूप में लगते हैं, इसलिए ये स्वरों के साथ रखे जाते हैं।
उत्तर: वर्ण विचार व्याकरण की नींव है। यदि हमें वर्णों के शुद्ध उच्चारण और लेखन का ज्ञान नहीं होगा, तो हम शब्दों की वर्तनी (Spelling) में गलतियाँ करेंगे। गलत वर्तनी से शब्द का अर्थ बदल जाता है, जिससे पूरा वाक्य अशुद्ध हो जाता है। अतः भाषा की शुद्धता और स्पष्टता बनाए रखने के लिए वर्ण विचार का गहन अध्ययन अनिवार्य है।