अध्याय 4: शब्द विचार (Morphology) – वर्गीकरण और भेद
हिंदी व्याकरण के दूसरे मुख्य अंग को ‘शब्द विचार’ कहते हैं। वर्णों के मेल से शब्द बनते हैं, लेकिन हर मेल शब्द नहीं कहलाता। केवल उन्हीं वर्ण समूहों को शब्द कहा जाता है जिनका कोई निश्चित अर्थ निकलता हो। इस अध्याय में हम शब्दों की उत्पत्ति, बनावट और उनके विभिन्न प्रयोगों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
1. शब्द की परिभाषा
एक या एक से अधिक वर्णों के मेल से बने सार्थक ध्वनि-समूह को शब्द कहते हैं। भाषा में शब्दों का बहुत महत्व है क्योंकि वाक्यों का निर्माण शब्दों से ही होता है और शब्दों के बिना विचारों की अभिव्यक्ति असंभव है।
– क + म + ल = कमल (सार्थक शब्द)
– ल + म + क = लमक (निरर्थक शब्द – इसका कोई अर्थ नहीं है)
2. शब्द और पद में अंतर
जब कोई शब्द स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होता है, तो वह ‘शब्द’ कहलाता है। परंतु, जब वही शब्द व्याकरण के नियमों (लिंग, वचन, कारक) में बंधकर वाक्य में प्रयुक्त होता है, तो वह ‘पद’ बन जाता है।
जैसे: ‘लड़का’ एक शब्द है। लेकिन “लड़का स्कूल जाता है” वाक्य में ‘लड़का’ एक पद है।
3. शब्दों का वर्गीकरण (Classification of Words)
हिंदी में शब्दों को मुख्य रूप से चार आधारों पर बाँटा गया है:
(क) उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर
यह बताता है कि शब्द कहाँ से आए हैं। इसके पाँच उपभेद हैं:
- तत्सम शब्द: जो संस्कृत से ज्यों के त्यों लिए गए हैं (जैसे: अग्नि, जल, वायु)।
- तद्भव शब्द: जो संस्कृत से बदलकर हिंदी में आए हैं (जैसे: आग, पानी, हवा)।
- देशज शब्द: जो स्थानीय बोलियों या क्षेत्रीय प्रभाव से बने हैं (जैसे: लोटा, पगड़ी, खिचड़ी)।
- विदेशज शब्द: जो विदेशी भाषाओं से आए हैं (जैसे: स्कूल, वकील, बटन, चाकू)।
- संकर शब्द: जो दो अलग भाषाओं के मेल से बने हैं (जैसे: रेलगाड़ी – अंग्रेजी + हिंदी)।
(ख) रचना या बनावट के आधार पर
इसके तीन उपभेद हैं:
- रूढ़ शब्द: जिनके टुकड़े करने पर कोई अर्थ नहीं निकलता (जैसे: घर, नल, फल)।
- यौगिक शब्द: जो दो सार्थक शब्दों के मेल से बनते हैं (जैसे: पाठशाला = पाठ + शाला)।
- योगरूढ़ शब्द: जो यौगिक तो होते हैं लेकिन किसी विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो जाते हैं (जैसे: लंबोदर – गणेश जी के लिए)।
(ग) प्रयोग के आधार पर
इसके दो मुख्य भेद हैं:
- विकारी शब्द: जिनमें लिंग, वचन या कारक के कारण परिवर्तन आता है (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया)।
- अविकारी शब्द (अव्यय): जिनमें कभी कोई बदलाव नहीं आता (क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक)।
(घ) अर्थ के आधार पर
इसके आधार पर सार्थक और निरर्थक दो भेद होते हैं। सार्थक के अंतर्गत पर्यायवाची, विलोम, अनेकार्थी शब्द आते हैं।
अभ्यास प्रश्नावली – शब्द विचार (15 विस्तृत प्रश्न-उत्तर)
उत्तर: ‘तत्सम’ (तत् + सम) का अर्थ है – उसके समान। ये वे शब्द हैं जो संस्कृत भाषा से बिना किसी परिवर्तन के हिंदी में आए हैं (जैसे: दुग्ध, हस्त, कर्पूर)। ‘तद्भव’ (तद् + भव) का अर्थ है – उससे उत्पन्न। ये वे शब्द हैं जो संस्कृत से विकसित होकर अपना रूप बदल चुके हैं (जैसे: दूध, हाथ, कपूर)। तत्सम शब्द प्रायः कठिन और साहित्यिक होते हैं, जबकि तद्भव सरल और बोलचाल के होते हैं।
उत्तर: 1. रूढ़: जिनके टुकड़े करने पर अर्थ लुप्त हो जाए (जैसे: ‘हाथ’ – हा + थ का कोई अर्थ नहीं)। 2. यौगिक: दो सार्थक शब्दों का मेल (जैसे: ‘हिमालय’ – हिम + आलय)। 3. योगरूढ़: जो मेल से बने हों पर अर्थ किसी तीसरे के लिए निश्चित हो (जैसे: ‘जलज’ – जल में जन्म लेने वाला, अर्थात् कमल)।
उत्तर: विकारी शब्द वे होते हैं जिनमें व्याकरणिक कारणों से विकार (परिवर्तन) आता है। ये चार प्रकार के होते हैं:
1. संज्ञा (जैसे: लड़का, लड़कों)
2. सर्वनाम (जैसे: मैं, हमें)
3. विशेषण (जैसे: काला, काली)
4. क्रिया (जैसे: जाता है, जाती है)
उत्तर: जो शब्द क्षेत्रीय बोलियों, आम जन-जीवन या आवश्यकतानुसार स्थानीय स्तर पर गढ़ लिए गए हैं और जिनका स्रोत संस्कृत नहीं है, उन्हें देशज शब्द कहते हैं। उदाहरण: लोटा, डिबिया, जूता, खटाखट, झाड़ू।
उत्तर: विदेशी आक्रमणों और व्यापारिक संबंधों के कारण जो शब्द अन्य देशों की भाषाओं से हिंदी में आए हैं, वे विदेशज कहलाते हैं।
– अंग्रेजी: कॉलेज, नर्स, डॉक्टर।
– अरबी/फारसी: वकील, किताब, बाजार, कागज।
उत्तर: दो अलग-अलग भाषाओं के शब्दों को मिलाकर जब एक नया शब्द बनाया जाता है, उसे संकर शब्द कहते हैं।
उदाहरण:
1. रेलगाड़ी (रेल – अंग्रेजी + गाड़ी – हिंदी)
2. छायादार (छाया – संस्कृत + दार – फारसी)
3. टिकटघर (टिकट – अंग्रेजी + घर – हिंदी)
उत्तर: जब कोई सार्थक शब्द वाक्य में प्रयोग किया जाता है, तो वह पद कहलाता है। शब्द स्वतंत्र होते हैं और शब्दकोश में पाए जाते हैं, जबकि पद वाक्य की इकाई होते हैं और व्याकरणिक नियमों से बंधे होते हैं। शब्द ‘कच्चा माल’ है और पद ‘तैयार वस्तु’ है।
उत्तर: व्याकरण में केवल सार्थक शब्दों का अध्ययन किया जाता है। परंतु, कभी-कभी बोलचाल में सार्थक शब्दों के साथ निरर्थक शब्द जुड़कर आते हैं (जैसे: चाय-वाय, पानी-वानी, रोटी-वोटी)। यहाँ ‘वाय’, ‘वानी’, ‘वोटी’ का अपना कोई अर्थ नहीं है, लेकिन ये सार्थक शब्द के साथ जुड़कर भाषा में प्रवाह लाते हैं।
उत्तर: पर्यायवाची: जब अलग-अलग शब्द एक ही अर्थ देते हैं (जैसे: सूर्य, भानु, रवि)।
अनेकार्थी: जब एक ही शब्द के अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थ होते हैं (जैसे: ‘कनक’ का अर्थ सोना भी है और धतूरा भी)।
उत्तर: वे शब्द जिनके रूप में लिंग, वचन, पुरुष, काल या कारक के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता, उन्हें अविकारी शब्द या अव्यय कहते हैं। जैसे: और, धीरे-धीरे, किंतु, शाबाश, में आदि। ये हमेशा एक जैसे ही रहते हैं।
उत्तर: ‘दशानन’ एक योगरूढ़ शब्द है। यह ‘दश’ और ‘आनन’ (मुख) के मेल से बना है, लेकिन इसका अर्थ ‘दस मुखों वाला’ न होकर केवल ‘रावण’ के लिए प्रसिद्ध (रूढ़) हो गया है।
उत्तर: प्रयोग के आधार पर शब्दों को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है:
1. विकारी (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया)
2. अविकारी (क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक)।
उत्तर: तद्भव शब्दों का निर्माण संस्कृत (तत्सम) शब्दों के उच्चारण में सरलता लाने के प्रयास में हुआ है। समय के साथ मुख-सुख के लिए कठिन संस्कृत शब्दों को सरल बना दिया गया, जैसे ‘अग्नि’ से ‘आग’ और ‘क्षेत्र’ से ‘खेत’।
उत्तर: योगरूढ़ शब्द और बहुव्रीहि समास दोनों एक ही सिद्धांत पर कार्य करते हैं। दोनों ही स्थितियों में दो शब्द मिलकर किसी तीसरे विशेष अर्थ की ओर संकेत करते हैं। उदाहरण के लिए ‘नीलकंठ’ योगरूढ़ शब्द भी है और बहुव्रीहि समास का उदाहरण भी है, क्योंकि यह शिव जी के लिए रूढ़ है।
उत्तर: शब्द विचार का ज्ञान होने से शब्दकोश (Vocabulary) समृद्ध होता है। शब्दों की उत्पत्ति और बनावट समझने से हम उनके सही अर्थ और सही स्थान पर प्रयोग की योग्यता विकसित करते हैं। यह शुद्ध लेखन और प्रभावी संवाद की पहली सीढ़ी है।