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अध्याय 6: सर्वनाम (Pronoun)





अध्याय 6: सर्वनाम (Pronoun) – परिभाषा, भेद और प्रयोग

हिंदी व्याकरण में संज्ञा के दोहराव को रोकने और भाषा को सुंदर व संक्षिप्त बनाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है, उसे सर्वनाम कहते हैं। ‘सर्वनाम’ का शाब्दिक अर्थ है—’सबका नाम’। यह वे शब्द हैं जो किसी एक के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं।

1. सर्वनाम की परिभाषा

संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहा जाता है। सर्वनाम संज्ञा की पुनरावृत्ति (Repetition) को रोकता है, जिससे वाक्य पढ़ने और सुनने में अरुचिकर नहीं लगता।

उदाहरण:
बिना सर्वनाम के: राम स्कूल जाता है, राम वहाँ पढ़ता है, राम का घर सुंदर है। (अटपटा लगता है)
सर्वनाम के साथ: राम स्कूल जाता है, वह वहाँ पढ़ता है, उसका घर सुंदर है। (यह सही है)

2. सर्वनाम के भेद (Types of Pronoun)

हिंदी व्याकरण में सर्वनाम के मुख्य रूप से 6 भेद होते हैं:

(क) पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal Pronoun)

जो सर्वनाम शब्द बोलने वाले (वक्ता), सुनने वाले (श्रोता) या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इसके तीन उपभेद हैं:

  • उत्तम पुरुष: बोलने वाला अपने लिए प्रयोग करता है (मैं, हम)।
  • मध्यम पुरुष: सुनने वाले के लिए प्रयोग होता है (तू, तुम, आप)।
  • अन्य पुरुष: किसी तीसरे व्यक्ति के लिए प्रयोग होता है (वह, वे)।

(ख) निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative Pronoun)

जो सर्वनाम किसी निश्चित वस्तु या व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं।
जैसे: यह मेरी पुस्तक है, वे कल आएंगे।

(ग) अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite Pronoun)

जिन सर्वनाम शब्दों से किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध नहीं होता।
जैसे: बाहर कोई खड़ा है, दाल में कुछ गिर गया है।

(घ) प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun)

जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग प्रश्न पूछने के लिए किया जाता है।
जैसे: वहाँ कौन है? तुम क्या लाए हो?

(ङ) संबंधवाचक सर्वनाम (Relative Pronoun)

जो सर्वनाम शब्द वाक्य में आए दूसरे संज्ञा या सर्वनाम शब्दों से संबंध बताते हैं।
जैसे: जो मेहनत करेगा, वह फल पाएगा। जैसा करोगे, वैसा भरोगे।

(च) निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun)

जिन सर्वनामों का प्रयोग कर्ता (Subject) स्वयं अपने लिए करता है।
जैसे: मैं यह काम अपने आप कर लूँगा। वह स्वयं चला जाएगा।

विशेष नोट: हिंदी में मूल सर्वनामों की संख्या 11 है: मैं, तू, आप, यह, वह, जो, सो, कौन, क्या, कोई, कुछ। इन्हीं से अन्य सर्वनाम शब्द बनते हैं।

3. सर्वनाम का रूपांतरण

सर्वनाम शब्दों पर लिंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह ‘जाता है’ और ‘जाती है’ दोनों में ‘वह’ ही रहता है। परंतु वचन और कारक के अनुसार इनके रूप बदल जाते हैं।

कारक एकवचन बहुवचन
कर्ता मैं / मैंने हम / हमने
कर्म मुझे / मुझको हमें / हमको
संबंध मेरा / मेरी हमारा / हमारी

अभ्यास प्रश्नावली – सर्वनाम (15 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर)

प्रश्न 1: सर्वनाम की आवश्यकता क्यों है? तर्क सहित उत्तर दें।

उत्तर: भाषा को सुगम, संक्षिप्त और प्रभावशाली बनाने के लिए सर्वनाम की आवश्यकता होती है। यदि सर्वनाम न हो, तो हमें बार-बार संज्ञा शब्दों को दोहराना पड़ेगा (जैसे- मोहन ने कहा कि मोहन मोहन की माँ से मिलेगा), जो भाषा के प्रवाह को बाधित करता है और सुनने में अरुचिकर लगता है।

प्रश्न 2: पुरुषवाचक सर्वनाम के तीनों भेदों को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: 1. उत्तम पुरुष: वक्ता अपने लिए (मैं पढ़ता हूँ)। 2. मध्यम पुरुष: श्रोता के लिए (तुम कहाँ जा रहे हो?)। 3. अन्य पुरुष: किसी तीसरे के लिए जिसके बारे में बात हो रही हो (वे खेल रहे हैं)।

प्रश्न 3: ‘आप’ शब्द का प्रयोग मध्यम पुरुष और निजवाचक में कैसे अलग-अलग होता है?

उत्तर: जब ‘आप’ का प्रयोग आदर देने के लिए सामने वाले व्यक्ति के लिए हो, तो वह मध्यम पुरुष है (जैसे: आप बैठिए)। लेकिन जब ‘आप’ का प्रयोग कर्ता स्वयं के लिए ‘अपने आप’ के अर्थ में करे, तो वह निजवाचक है (जैसे: मैं आप ही चला जाऊँगा)।

प्रश्न 4: निश्चयवाचक और अनिश्चयवाचक सर्वनाम में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: निश्चयवाचक सर्वनाम किसी निश्चित वस्तु की ओर पक्का संकेत करता है (जैसे: यह मेरा घर है)। अनिश्चयवाचक सर्वनाम में वस्तु या व्यक्ति का ज्ञान निश्चित नहीं होता (जैसे: कोई बुला रहा है), यहाँ यह पता नहीं कि बुलाने वाला कौन है।

प्रश्न 5: प्रश्नवाचक सर्वनाम ‘कौन’ और ‘क्या’ का प्रयोग किनके लिए होता है?

उत्तर: ‘कौन’ का प्रयोग प्रायः सजीव प्राणियों (व्यक्तियों) के लिए किया जाता है (जैसे: दरवाजे पर कौन है?)। ‘क्या’ का प्रयोग प्रायः निर्जीव वस्तुओं या भावों के लिए किया जाता है (जैसे: तुम्हारे हाथ में क्या है?)।

प्रश्न 6: संबंधवाचक सर्वनाम के दो प्रसिद्ध युग्म (जोड़े) बताइए।

उत्तर: 1. जो – सो (जो जागेगा, सो पावेगा)। 2. जैसा – वैसा (जैसा देश, वैसा भेष)। ये शब्द एक वाक्य का दूसरे वाक्य से संबंध जोड़ते हैं।

प्रश्न 7: क्या सर्वनाम शब्दों का लिंग बदलता है?

उत्तर: नहीं, सर्वनाम शब्दों का रूप लिंग के आधार पर नहीं बदलता। क्रिया के माध्यम से ही लिंग का पता चलता है। उदाहरण: ‘वह खेल रहा है’ (पुल्लिंग) और ‘वह खेल रही है’ (स्त्रीलिंग)। दोनों वाक्यों में ‘वह’ समान है।

प्रश्न 8: सर्वनाम में कौन सा कारक नहीं होता?

उत्तर: सर्वनाम शब्दों में ‘सम्बोधन कारक’ (हे, अरे) नहीं होता। हम सर्वनाम को पुकार नहीं सकते, संबोधन केवल संज्ञा का ही होता है।

प्रश्न 9: ‘कुछ’ शब्द का प्रयोग अनिश्चयवाचक सर्वनाम के रूप में एक उदाहरण देकर समझाइए।

उत्तर: उदाहरण: “मुझे खाने के लिए कुछ दे दो।” यहाँ ‘कुछ’ शब्द भोजन की किसी वस्तु की ओर संकेत कर रहा है, लेकिन वह वस्तु क्या है, यह निश्चित नहीं है।

प्रश्न 10: उत्तम पुरुष ‘मैं’ का बहुवचन रूप क्या है?

उत्तर: ‘मैं’ एकवचन है और इसका बहुवचन रूप ‘हम’ होता है। कारक चिन्हों के साथ यह ‘हमने’, ‘हमें’, ‘हमारा’ आदि में बदल जाता है।

प्रश्न 11: निजवाचक सर्वनाम ‘स्वयं’ का वाक्य प्रयोग कीजिए।

उत्तर: वाक्य: “सफलता पाने के लिए हमें स्वयं मेहनत करनी होगी।” यहाँ ‘स्वयं’ कर्ता द्वारा अपने लिए प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 12: अन्य पुरुष सर्वनाम और निश्चयवाचक सर्वनाम ‘वह’ में क्या अंतर है?

उत्तर: जब ‘वह’ किसी अनुपस्थित व्यक्ति के लिए आए, तो वह अन्य पुरुष है (जैसे: वह बीमार है)। जब ‘वह’ किसी वस्तु की ओर संकेत करे, तो वह निश्चयवाचक है (जैसे: वह मेरी कार है)।

प्रश्न 13: सर्वनाम के कितने मूल रूप माने गए हैं?

उत्तर: सर्वनाम के 11 मूल रूप माने गए हैं: मैं, तू, आप, यह, वह, जो, सो, कोई, कुछ, कौन, क्या।

प्रश्न 14: ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’ में कौन सा सर्वनाम है?

उत्तर: इसमें ‘संबंधवाचक सर्वनाम’ का आभास होता है क्योंकि ‘जहाँ’ और ‘वहाँ’ स्थानवाचक संबंधों को दर्शा रहे हैं।

प्रश्न 15: सर्वनाम का पद परिचय देते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर: सर्वनाम का पद परिचय देते समय सर्वनाम का भेद, पुरुष (यदि पुरुषवाचक हो), लिंग, वचन, कारक और क्रिया के साथ उसके संबंध का उल्लेख करना चाहिए।


अध्याय 5: संज्ञा (Noun)





अध्याय 5: संज्ञा (Noun) – परिभाषा, भेद और उदाहरण

हिंदी व्याकरण में ‘विकारी शब्दों’ के अंतर्गत सबसे पहला और महत्वपूर्ण भाग संज्ञा है। संसार में ऐसी कोई वस्तु, व्यक्ति या स्थान नहीं है जिसका कोई नाम न हो। व्याकरण की दृष्टि से इसी ‘नाम’ को संज्ञा कहा जाता है। बिना संज्ञा के भाषा अधूरी है क्योंकि हम बिना नाम लिए किसी के बारे में बात नहीं कर सकते।

1. संज्ञा की परिभाषा

किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, प्राणी, गुण, दोष, भाव या अवस्था के नाम को संज्ञा कहते हैं। सरल शब्दों में, नाम का ही दूसरा नाम संज्ञा है।

उदाहरण:
व्यक्ति: राम, महात्मा गांधी, सचिन तेंदुलकर।
वस्तु: मेज, कलम, मोबाइल, पुस्तक।
स्थान: दिल्ली, मुंबई, स्कूल, बाजार।
भाव/अवस्था: मिठास, बुढ़ापा, ईमानदारी, क्रोध।

2. संज्ञा के भेद (Types of Noun)

हिंदी व्याकरण के अनुसार संज्ञा के मुख्य रूप से तीन भेद माने जाते हैं, परंतु अंग्रेजी व्याकरण के प्रभाव के कारण अब इसके पाँच भेदों का अध्ययन किया जाता है:

(क) व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun)

जिस संज्ञा शब्द से किसी विशेष व्यक्ति, विशेष वस्तु या विशेष स्थान का बोध हो, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। यह हमेशा एकवचन में होती है।

जैसे: हिमालय (विशेष पर्वत), गंगा (विशेष नदी), भारत (विशेष देश), राम (विशेष व्यक्ति)।

(ख) जातिवाचक संज्ञा (Common Noun)

जिस संज्ञा शब्द से उसकी पूरी जाति या श्रेणी का बोध हो, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।

जैसे: लड़का (सभी लड़कों के लिए), पर्वत (सभी पर्वतों के लिए), नदी (सभी नदियों के लिए), नगर (सभी शहरों के लिए)।

(ग) भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun)

जिन शब्दों से किसी प्राणी या वस्तु के गुण, दोष, दशा, स्वभाव या मन के भाव का बोध हो, उन्हें भाववाचक संज्ञा कहते हैं। इन्हें केवल अनुभव किया जा सकता है, देखा या स्पर्श नहीं किया जा सकता।

जैसे: बचपन, प्रेम, घृणा, शत्रुता, ऊँचाई, थकावट।

(घ) द्रव्यवाचक संज्ञा (Material Noun)

जिन संज्ञा शब्दों से किसी द्रव्य, पदार्थ या धातु का बोध हो, उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। इन्हें मापा या तोला जा सकता है, गिना नहीं जा सकता।

जैसे: सोना, चाँदी, तेल, पानी, दूध, कोयला, घी।

(ङ) समूहवाचक संज्ञा (Collective Noun)

जिन संज्ञा शब्दों से किसी समूह या समुदाय का बोध हो, उन्हें समूहवाचक संज्ञा कहते हैं।

जैसे: कक्षा, सेना, भीड़, गुच्छा, सभा, परिवार।

3. भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण

भाववाचक संज्ञाएँ मुख्य रूप से पाँच प्रकार से बनाई जा सकती हैं:

  • जातिवाचक संज्ञा से: बच्चा → बचपन, मित्र → मित्रता।
  • सर्वनाम से: अपना → अपनापन, निज → निजत्व।
  • विशेषण से: मीठा → मिठास, सुंदर → सुंदरता।
  • क्रिया से: थकना → थकावट, पढ़ना → पढ़ाई।
  • अव्यय से: निकट → निकटता, दूर → दूरी।

अभ्यास प्रश्नावली – संज्ञा (15 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर)

प्रश्न 1: व्यक्तिवाचक और जातिवाचक संज्ञा में क्या अंतर है?

उत्तर: व्यक्तिवाचक संज्ञा किसी विशेष (Specific) नाम का बोध कराती है, जबकि जातिवाचक संज्ञा उस पूरी श्रेणी (Category) का बोध कराती है। उदाहरण के लिए ‘गंगा’ व्यक्तिवाचक संज्ञा है क्योंकि वह एक विशेष नदी है, लेकिन ‘नदी’ जातिवाचक संज्ञा है क्योंकि वह दुनिया की सभी नदियों के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 2: भाववाचक संज्ञा की पहचान क्या है?

उत्तर: भाववाचक संज्ञाएँ अमूर्त (Abstract) होती हैं। इन्हें हम आँखों से देख नहीं सकते और न ही हाथों से छू सकते हैं। इन्हें केवल हृदय से अनुभव किया जा सकता है। जैसे ‘ईमानदारी’ एक गुण है जिसे महसूस किया जा सकता है, उसे भौतिक रूप में देखा नहीं जा सकता।

प्रश्न 3: क्या जातिवाचक संज्ञा कभी व्यक्तिवाचक संज्ञा बन सकती है? उदाहरण दें।

उत्तर: हाँ, जब कोई जातिवाचक शब्द किसी विशेष व्यक्ति के लिए रूढ़ हो जाता है। जैसे: “पंडित जी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे।” यहाँ ‘पंडित’ एक जाति है, लेकिन इस वाक्य में यह केवल ‘जवाहरलाल नेहरू’ के लिए प्रयोग हुआ है, इसलिए यहाँ यह व्यक्तिवाचक संज्ञा है।

प्रश्न 4: द्रव्यवाचक संज्ञा के पाँच उदाहरण दीजिए।

उत्तर: द्रव्यवाचक संज्ञा के उदाहरण: 1. लोहा, 2. पीतल, 3. ऑक्सीजन, 4. पेट्रोल, 5. चीनी। इन सभी को तौला या मापा जाता है।

प्रश्न 5: समूहवाचक संज्ञा से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: वे शब्द जो किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे समूह (Group) का बोध कराते हैं, समूहवाचक संज्ञा कहलाते हैं। जैसे ‘सेना’ शब्द कहते ही सैनिकों के समूह का चित्र उभरता है, न कि किसी एक सैनिक का।

प्रश्न 6: ‘मिठास’ और ‘मीठा’ में व्याकरणिक अंतर क्या है?

उत्तर: ‘मीठा’ एक विशेषण है जो किसी वस्तु की विशेषता बताता है (जैसे: मीठा फल)। जबकि ‘मिठास’ एक भाववाचक संज्ञा है जो उस फल के अंदर के गुण या भाव का बोध कराती है।

प्रश्न 7: व्यक्तिवाचक संज्ञा का बहुवचन में प्रयोग कब होता है?

उत्तर: जब व्यक्तिवाचक संज्ञा किसी व्यक्ति विशेष का नाम न रहकर उस जैसे गुणों वाले अनेक व्यक्तियों का बोध कराने लगे। जैसे: “आज के युग में भी हरिश्चंद्रों की कमी नहीं है।” यहाँ ‘हरिश्चंद्र’ सत्यवादी व्यक्तियों की श्रेणी का बोध करा रहा है, इसलिए यह जातिवाचक की तरह प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 8: भाववाचक संज्ञाएँ बनाने के लिए किन प्रत्ययों का प्रयोग होता है?

उत्तर: भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए शब्दों के अंत में प्रायः ता, त्व, पन, आवट, आहट, ई, आस जैसे प्रत्यय जोड़े जाते हैं। जैसे: लघु + ता = लघुता, अपना + पन = अपनापन, मुस्कराना + आहट = मुस्कराहट।

प्रश्न 9: ‘पानी’ और ‘दूध’ को किस संज्ञा भेद में रखेंगे और क्यों?

उत्तर: ‘पानी’ और ‘दूध’ को द्रव्यवाचक संज्ञा में रखा जाता है क्योंकि ये तरल पदार्थ हैं और इन्हें गिना नहीं जा सकता, केवल मापा जा सकता है। आधुनिक व्याकरण में इन्हें जातिवाचक संज्ञा के अंतर्गत भी माना जाता है।

प्रश्न 10: संज्ञा को ‘विकारी शब्द’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: संज्ञा को विकारी शब्द इसलिए कहा जाता है क्योंकि लिंग, वचन और कारक के प्रभाव से संज्ञा शब्दों के रूप बदल जाते हैं। जैसे: लड़का (एकवचन) → लड़के (बहुवचन), लड़का (पुल्लिंग) → लड़की (स्त्रीलिंग)।

प्रश्न 11: क्रिया से भाववाचक संज्ञा बनाने के दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर: 1. लिखना (क्रिया) → लिखावट (भाववाचक संज्ञा), 2. दौड़ना (क्रिया) → दौड़ (भाववाचक संज्ञा)।

प्रश्न 12: ‘भीड़’ और ‘कक्षा’ में कौन सी संज्ञा है?

उत्तर: ‘भीड़’ और ‘कक्षा’ समूहवाचक संज्ञाएँ हैं क्योंकि ये व्यक्तियों और छात्रों के समूह का बोध कराती हैं।

प्रश्न 13: सर्वनाम से भाववाचक संज्ञा कैसे बनती है?

उत्तर: सर्वनाम शब्दों में प्रत्यय जोड़कर भाववाचक संज्ञा बनाई जाती है। जैसे: ‘अहं’ से ‘अहंकार’ और ‘स्व’ से ‘स्वत्व’।

प्रश्न 14: अर्थ की दृष्टि से संज्ञा के कितने भेद हैं?

उत्तर: अर्थ की दृष्टि से संज्ञा के पाँच भेद हैं: व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक, द्रव्यवाचक और समूहवाचक। प्राचीन व्याकरण के अनुसार मुख्य तीन ही भेद हैं।

प्रश्न 15: संज्ञा का वाक्य में क्या महत्व है?

उत्तर: संज्ञा वाक्य का आधार होती है। बिना संज्ञा (या सर्वनाम) के वाक्य में कर्ता या कर्म का होना असंभव है। संज्ञा ही वह तत्व है जिसके बारे में वाक्य में कुछ कहा जाता है या जो क्रिया को संपादित करता है।


अध्याय 4: शब्द विचार





अध्याय 4: शब्द विचार (Morphology) – वर्गीकरण और भेद

हिंदी व्याकरण के दूसरे मुख्य अंग को ‘शब्द विचार’ कहते हैं। वर्णों के मेल से शब्द बनते हैं, लेकिन हर मेल शब्द नहीं कहलाता। केवल उन्हीं वर्ण समूहों को शब्द कहा जाता है जिनका कोई निश्चित अर्थ निकलता हो। इस अध्याय में हम शब्दों की उत्पत्ति, बनावट और उनके विभिन्न प्रयोगों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

1. शब्द की परिभाषा

एक या एक से अधिक वर्णों के मेल से बने सार्थक ध्वनि-समूह को शब्द कहते हैं। भाषा में शब्दों का बहुत महत्व है क्योंकि वाक्यों का निर्माण शब्दों से ही होता है और शब्दों के बिना विचारों की अभिव्यक्ति असंभव है।

उदाहरण:
– क + म + ल = कमल (सार्थक शब्द)
– ल + म + क = लमक (निरर्थक शब्द – इसका कोई अर्थ नहीं है)

2. शब्द और पद में अंतर

जब कोई शब्द स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होता है, तो वह ‘शब्द’ कहलाता है। परंतु, जब वही शब्द व्याकरण के नियमों (लिंग, वचन, कारक) में बंधकर वाक्य में प्रयुक्त होता है, तो वह ‘पद’ बन जाता है।

जैसे: ‘लड़का’ एक शब्द है। लेकिन “लड़का स्कूल जाता है” वाक्य में ‘लड़का’ एक पद है।

3. शब्दों का वर्गीकरण (Classification of Words)

हिंदी में शब्दों को मुख्य रूप से चार आधारों पर बाँटा गया है:

(क) उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर

यह बताता है कि शब्द कहाँ से आए हैं। इसके पाँच उपभेद हैं:

  • तत्सम शब्द: जो संस्कृत से ज्यों के त्यों लिए गए हैं (जैसे: अग्नि, जल, वायु)।
  • तद्भव शब्द: जो संस्कृत से बदलकर हिंदी में आए हैं (जैसे: आग, पानी, हवा)।
  • देशज शब्द: जो स्थानीय बोलियों या क्षेत्रीय प्रभाव से बने हैं (जैसे: लोटा, पगड़ी, खिचड़ी)।
  • विदेशज शब्द: जो विदेशी भाषाओं से आए हैं (जैसे: स्कूल, वकील, बटन, चाकू)।
  • संकर शब्द: जो दो अलग भाषाओं के मेल से बने हैं (जैसे: रेलगाड़ी – अंग्रेजी + हिंदी)।

(ख) रचना या बनावट के आधार पर

इसके तीन उपभेद हैं:

  • रूढ़ शब्द: जिनके टुकड़े करने पर कोई अर्थ नहीं निकलता (जैसे: घर, नल, फल)।
  • यौगिक शब्द: जो दो सार्थक शब्दों के मेल से बनते हैं (जैसे: पाठशाला = पाठ + शाला)।
  • योगरूढ़ शब्द: जो यौगिक तो होते हैं लेकिन किसी विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो जाते हैं (जैसे: लंबोदर – गणेश जी के लिए)।

(ग) प्रयोग के आधार पर

इसके दो मुख्य भेद हैं:

  1. विकारी शब्द: जिनमें लिंग, वचन या कारक के कारण परिवर्तन आता है (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया)।
  2. अविकारी शब्द (अव्यय): जिनमें कभी कोई बदलाव नहीं आता (क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक)।

(घ) अर्थ के आधार पर

इसके आधार पर सार्थक और निरर्थक दो भेद होते हैं। सार्थक के अंतर्गत पर्यायवाची, विलोम, अनेकार्थी शब्द आते हैं।

अभ्यास प्रश्नावली – शब्द विचार (15 विस्तृत प्रश्न-उत्तर)

प्रश्न 1: तत्सम और तद्भव शब्दों में मुख्य अंतर क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट करें।

उत्तर: ‘तत्सम’ (तत् + सम) का अर्थ है – उसके समान। ये वे शब्द हैं जो संस्कृत भाषा से बिना किसी परिवर्तन के हिंदी में आए हैं (जैसे: दुग्ध, हस्त, कर्पूर)। ‘तद्भव’ (तद् + भव) का अर्थ है – उससे उत्पन्न। ये वे शब्द हैं जो संस्कृत से विकसित होकर अपना रूप बदल चुके हैं (जैसे: दूध, हाथ, कपूर)। तत्सम शब्द प्रायः कठिन और साहित्यिक होते हैं, जबकि तद्भव सरल और बोलचाल के होते हैं।

प्रश्न 2: रूढ़, यौगिक और योगरूढ़ शब्दों को उदाहरण देकर समझाइए।

उत्तर: 1. रूढ़: जिनके टुकड़े करने पर अर्थ लुप्त हो जाए (जैसे: ‘हाथ’ – हा + थ का कोई अर्थ नहीं)। 2. यौगिक: दो सार्थक शब्दों का मेल (जैसे: ‘हिमालय’ – हिम + आलय)। 3. योगरूढ़: जो मेल से बने हों पर अर्थ किसी तीसरे के लिए निश्चित हो (जैसे: ‘जलज’ – जल में जन्म लेने वाला, अर्थात् कमल)।

प्रश्न 3: विकारी शब्द कितने प्रकार के होते हैं? नाम लिखिए।

उत्तर: विकारी शब्द वे होते हैं जिनमें व्याकरणिक कारणों से विकार (परिवर्तन) आता है। ये चार प्रकार के होते हैं:
1. संज्ञा (जैसे: लड़का, लड़कों)
2. सर्वनाम (जैसे: मैं, हमें)
3. विशेषण (जैसे: काला, काली)
4. क्रिया (जैसे: जाता है, जाती है)

प्रश्न 4: देशज शब्द किन्हें कहते हैं? पाँच उदाहरण दीजिए।

उत्तर: जो शब्द क्षेत्रीय बोलियों, आम जन-जीवन या आवश्यकतानुसार स्थानीय स्तर पर गढ़ लिए गए हैं और जिनका स्रोत संस्कृत नहीं है, उन्हें देशज शब्द कहते हैं। उदाहरण: लोटा, डिबिया, जूता, खटाखट, झाड़ू।

प्रश्न 5: विदेशज (आगत) शब्द क्या हैं? अंग्रेजी और अरबी भाषा के दो-दो उदाहरण दें।

उत्तर: विदेशी आक्रमणों और व्यापारिक संबंधों के कारण जो शब्द अन्य देशों की भाषाओं से हिंदी में आए हैं, वे विदेशज कहलाते हैं।
– अंग्रेजी: कॉलेज, नर्स, डॉक्टर।
– अरबी/फारसी: वकील, किताब, बाजार, कागज।

प्रश्न 6: संकर शब्द (Hybrid Words) की परिभाषा और उदाहरण दीजिए।

उत्तर: दो अलग-अलग भाषाओं के शब्दों को मिलाकर जब एक नया शब्द बनाया जाता है, उसे संकर शब्द कहते हैं।
उदाहरण:
1. रेलगाड़ी (रेल – अंग्रेजी + गाड़ी – हिंदी)
2. छायादार (छाया – संस्कृत + दार – फारसी)
3. टिकटघर (टिकट – अंग्रेजी + घर – हिंदी)

प्रश्न 7: पद किसे कहते हैं? शब्द और पद का संबंध बताइए।

उत्तर: जब कोई सार्थक शब्द वाक्य में प्रयोग किया जाता है, तो वह पद कहलाता है। शब्द स्वतंत्र होते हैं और शब्दकोश में पाए जाते हैं, जबकि पद वाक्य की इकाई होते हैं और व्याकरणिक नियमों से बंधे होते हैं। शब्द ‘कच्चा माल’ है और पद ‘तैयार वस्तु’ है।

प्रश्न 8: निरर्थक शब्दों का व्याकरण में क्या स्थान है?

उत्तर: व्याकरण में केवल सार्थक शब्दों का अध्ययन किया जाता है। परंतु, कभी-कभी बोलचाल में सार्थक शब्दों के साथ निरर्थक शब्द जुड़कर आते हैं (जैसे: चाय-वाय, पानी-वानी, रोटी-वोटी)। यहाँ ‘वाय’, ‘वानी’, ‘वोटी’ का अपना कोई अर्थ नहीं है, लेकिन ये सार्थक शब्द के साथ जुड़कर भाषा में प्रवाह लाते हैं।

प्रश्न 9: अनेकार्थी और पर्यायवाची शब्दों में क्या अंतर है?

उत्तर: पर्यायवाची: जब अलग-अलग शब्द एक ही अर्थ देते हैं (जैसे: सूर्य, भानु, रवि)।
अनेकार्थी: जब एक ही शब्द के अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थ होते हैं (जैसे: ‘कनक’ का अर्थ सोना भी है और धतूरा भी)।

प्रश्न 10: अविकारी शब्द या अव्यय किसे कहते हैं?

उत्तर: वे शब्द जिनके रूप में लिंग, वचन, पुरुष, काल या कारक के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता, उन्हें अविकारी शब्द या अव्यय कहते हैं। जैसे: और, धीरे-धीरे, किंतु, शाबाश, में आदि। ये हमेशा एक जैसे ही रहते हैं।

प्रश्न 11: रचना के आधार पर ‘दशानन’ किस प्रकार का शब्द है?

उत्तर: ‘दशानन’ एक योगरूढ़ शब्द है। यह ‘दश’ और ‘आनन’ (मुख) के मेल से बना है, लेकिन इसका अर्थ ‘दस मुखों वाला’ न होकर केवल ‘रावण’ के लिए प्रसिद्ध (रूढ़) हो गया है।

प्रश्न 12: प्रयोग के आधार पर शब्दों को कितने भागों में बाँटा गया है?

उत्तर: प्रयोग के आधार पर शब्दों को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है:
1. विकारी (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया)
2. अविकारी (क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक)।

प्रश्न 13: तद्भव शब्दों का निर्माण कैसे होता है?

उत्तर: तद्भव शब्दों का निर्माण संस्कृत (तत्सम) शब्दों के उच्चारण में सरलता लाने के प्रयास में हुआ है। समय के साथ मुख-सुख के लिए कठिन संस्कृत शब्दों को सरल बना दिया गया, जैसे ‘अग्नि’ से ‘आग’ और ‘क्षेत्र’ से ‘खेत’।

प्रश्न 14: योगरूढ़ शब्द और बहुव्रीहि समास में क्या समानता है?

उत्तर: योगरूढ़ शब्द और बहुव्रीहि समास दोनों एक ही सिद्धांत पर कार्य करते हैं। दोनों ही स्थितियों में दो शब्द मिलकर किसी तीसरे विशेष अर्थ की ओर संकेत करते हैं। उदाहरण के लिए ‘नीलकंठ’ योगरूढ़ शब्द भी है और बहुव्रीहि समास का उदाहरण भी है, क्योंकि यह शिव जी के लिए रूढ़ है।

प्रश्न 15: शब्द विचार का ज्ञान भाषा सीखने के लिए क्यों आवश्यक है?

उत्तर: शब्द विचार का ज्ञान होने से शब्दकोश (Vocabulary) समृद्ध होता है। शब्दों की उत्पत्ति और बनावट समझने से हम उनके सही अर्थ और सही स्थान पर प्रयोग की योग्यता विकसित करते हैं। यह शुद्ध लेखन और प्रभावी संवाद की पहली सीढ़ी है।


अध्याय 3: संधि





अध्याय 3: संधि (Sandhi) – विस्तृत नियम और उदाहरण

हिंदी व्याकरण में ‘संधि’ का अर्थ है—मेल या जोड़। जब दो निकटवर्ती वर्ण आपस में मिलते हैं और उनके मिलने से जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते हैं। संधि केवल शब्दों का जोड़ नहीं, बल्कि ध्वनियों का मेल है।

1. संधि की परिभाषा

दो वर्णों के पास-पास आने के कारण उनके आपसी मेल से जो परिवर्तन होता है, वह संधि कहलाता है। संधि में पहले शब्द का अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण आपस में मिलते हैं।

उदाहरण:
– विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (आ + अ = आ)
– सूर्य + उदय = सूर्योदय (अ + उ = ओ)
– सत् + जन = सज्जन (त् + ज = ज्ज)

2. संधि के मुख्य भेद

वर्णों के आधार पर संधि के तीन मुख्य भेद होते हैं:

  1. स्वर संधि (Vowel Sandhi)
  2. व्यंजन संधि (Consonant Sandhi)
  3. विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)

3. स्वर संधि (Swar Sandhi)

जब स्वर वर्ण का मेल स्वर वर्ण से होता है और उससे जो परिवर्तन आता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। इसके पाँच उपभेद हैं:

(क) दीर्घ संधि

जब ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ के बाद समान स्वर आए, तो दोनों मिलकर दीर्घ (आ, ई, ऊ) हो जाते हैं।

नियम: अ/आ + अ/आ = आ | इ/ई + इ/ई = ई | उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ

उदाहरण: पुस्तक + आलय = पुस्तकालय, रवि + इंद्र = रवींद्र।

(ख) गुण संधि

यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद इ/ई आए तो ‘ए’, उ/ऊ आए तो ‘ओ’ और ऋ आए तो ‘अर’ हो जाता है।

उदाहरण: नर + इंद्र = नरेंद्र, महा + उत्सव = महोत्सव, सप्त + ऋषि = सप्तर्षि।

(ग) वृद्धि संधि

यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ए/ऐ आए तो ‘ऐ’ और ओ/औ आए तो ‘औ’ हो जाता है।

उदाहरण: एक + एक = एकैक, महा + औषधि = महौषधि।

(घ) यण संधि

यदि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए, तो इ/ई का ‘य’, उ/ऊ का ‘व’ और ऋ का ‘र’ हो जाता है।

उदाहरण: अति + आवश्यक = अत्यावश्यक, सु + आगत = स्वागत।

(ङ) अयादि संधि

यदि ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई भिन्न स्वर आए, तो ए का ‘अय’, ऐ का ‘आय’, ओ का ‘अव’ और औ का ‘आव’ हो जाता है।

उदाहरण: ने + अन = नयन, पौ + अक = पावक।

4. व्यंजन संधि (Vyanjan Sandhi)

व्यंजन के बाद स्वर या व्यंजन आने से जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।

प्रमुख नियम:
– वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे में बदलना: दिक् + अंबर = दिगंबर।
– त् संबंधी नियम: उत् + लास = उल्लास, उत् + जवल = उज्ज्वल।
– म् संबंधी नियम: सम् + कल्प = संकल्प।

5. विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)

विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं।

उदाहरण: निः + चल = निश्चल, मनः + हर = मनोहर, दुः + गम = दुर्गम।

अभ्यास प्रश्नावली – संधि (15 विस्तृत प्रश्न-उत्तर)

प्रश्न 1: संधि और संयोग में क्या अंतर है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: संधि में दो वर्णों के मेल से एक विकार या परिवर्तन (Change) उत्पन्न होता है (जैसे: हिम + आलय = हिमालय), यहाँ ‘अ’ और ‘आ’ मिलकर ‘आ’ बन गए। इसके विपरीत, ‘संयोग’ में दो वर्ण बिना किसी परिवर्तन के आपस में केवल जुड़ जाते हैं (जैसे: कल + म = कलम)। संधि में ध्वनियाँ बदलती हैं, संयोग में केवल वर्णों का क्रम जुड़ता है।

प्रश्न 2: दीर्घ संधि के चार उदाहरण देकर समझाइए।

उत्तर: दीर्घ संधि तब होती है जब समान स्वर मिलते हैं:
1. अ + अ = आ : मत + अनुसार = मतानुसार
2. आ + आ = आ : दया + आनंद = दयानंद
3. इ + इ = ई : गिरि + इंद्र = गिरींद्र
4. उ + उ = ऊ : भानु + उदय = भानूदय

प्रश्न 3: यण संधि की पहचान क्या है? इसके नियम लिखिए।

उत्तर: यण संधि की सबसे बड़ी पहचान यह है कि ‘य’, ‘व’ या ‘र’ से पहले प्रायः आधा अक्षर (व्यंजन) आता है। इसके नियम हैं:
– इ/ई + भिन्न स्वर = य (अति + अंत = अत्यंत)
– उ/ऊ + भिन्न स्वर = व (अनु + अय = अन्वय)
– ऋ + भिन्न स्वर = र (पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा)

प्रश्न 4: ‘महोत्सव’ और ‘महौषधि’ में कौन सी संधि है? विच्छेद सहित बताइए।

उत्तर: 1. महोत्सव: महा + उत्सव (आ + उ = ओ)। इसमें ‘गुण संधि’ है क्योंकि यहाँ ओ की मात्रा बनी है।
2. महौषधि: महा + औषधि (आ + औ = औ)। इसमें ‘वृद्धि संधि’ है क्योंकि यहाँ औ की मात्रा में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 5: व्यंजन संधि में ‘वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन’ का क्या नियम है?

उत्तर: यदि किसी वर्ग के प्रथम वर्ण (क, च, ट, त, प) के बाद कोई स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, ल, व आए, तो प्रथम वर्ण अपने ही वर्ग के तीसरे वर्ण (ग, ज, ड, द, ब) में बदल जाता है। जैसे: अच् + अंत = अजंत (च, ज में बदल गया), वाक् + ईश = वागीश (क, ग में बदल गया)।

प्रश्न 6: अयादि संधि के चारों रूपों (अय, आय, अव, आव) के एक-एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: अयादि संधि के उदाहरण निम्नलिखित हैं:
1. ए + अ = अय : शे + अन = शयन
2. ऐ + अ = आय : गै + अक = गायक
3. ओ + अ = अव : भो + अन = भवन
4. औ + अ = आव : पौ + अन = पावन

प्रश्न 7: विसर्ग संधि में विसर्ग का ‘ओ’ कब हो जाता है?

उत्तर: यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में भी ‘अ’ या किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण या य, र, ल, व, ह हो, तो विसर्ग ‘ओ’ में बदल जाता है। उदाहरण: मनः + अनुकूल = मनोनुकूल, तपः + बल = तपोबल, यशः + दा = यशोदा।

प्रश्न 8: संधि विच्छेद (Sandhi Viched) किसे कहते हैं? उदाहरण सहित बताएं।

उत्तर: संधि द्वारा बने हुए शब्दों को पुनः उनके मूल रूप में अलग-अलग कर देने की प्रक्रिया को संधि विच्छेद कहते हैं। जैसे: ‘परोपकार’ एक संधि पद है, इसका विच्छेद ‘पर + उपकार’ होगा। यह संधि के नियमों को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न 9: ‘उज्ज्वल’ और ‘सज्जन’ का संधि विच्छेद कीजिए और नियम बताइए।

उत्तर: 1. उज्ज्वल: उत् + ज्वल।
2. सज्जन: सत् + जन।
नियम: यदि ‘त्’ के बाद ‘ज’ या ‘झ’ आए, तो ‘त्’ का ‘ज्’ हो जाता है। यह व्यंजन संधि का एक महत्वपूर्ण नियम है।

प्रश्न 10: गुण संधि और वृद्धि संधि में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: गुण संधि में ‘ए’ (एक मात्रा) और ‘ओ’ (एक मात्रा) का निर्माण होता है (जैसे: देव + इंद्र = देवेंद्र)। जबकि वृद्धि संधि में ‘ऐ’ (दो मात्राएं) और ‘औ’ (दो मात्राएं) का निर्माण होता है (जैसे: सदा + एव = सदैव)। सरल शब्दों में, गुण संधि में गुण बदलते हैं और वृद्धि संधि में मात्राओं में वृद्धि होती है।

प्रश्न 11: ‘निः + संदेह’ और ‘निः + फल’ की संधि क्या होगी?

उत्तर: 1. निः + संदेह = निस्संदेह (यहाँ विसर्ग आधे ‘स’ में बदल गया है)।
2. निः + फल = निष्फल (यहाँ विसर्ग षट्कोण वाले ‘ष’ में बदल गया है)। यह विसर्ग संधि के नियमों के अंतर्गत आता है।

प्रश्न 12: व्यंजन संधि के ‘म्’ संबंधी अनुस्वार नियम को समझाइए।

उत्तर: यदि ‘म्’ के बाद कोई भी स्पर्श व्यंजन (क से म तक) आए, तो ‘म्’ उसी वर्ग के पंचम वर्ण (अनुस्वार) में बदल जाता है। उदाहरण: सम् + कल्प = संकल्प, सम् + चय = संचय, सम् + पूर्ण = संपूर्ण।

प्रश्न 13: ‘स्वागत’ शब्द का संधि विच्छेद क्या है? इसमें कौन सी संधि प्रयुक्त हुई है?

उत्तर: ‘स्वागत’ का संधि विच्छेद ‘सु + आगत’ है। इसमें ‘यण स्वर संधि’ है क्योंकि यहाँ ‘उ’ का मेल ‘आ’ से होने पर ‘व’ का निर्माण हुआ है और प्रथम वर्ण आधा हो गया है।

प्रश्न 14: क्या संधि केवल संस्कृत के शब्दों में होती है?

उत्तर: नहीं, संधि हिंदी की अपनी प्रवृत्तियों में भी होती है, जिसे ‘हिंदी की संधियाँ’ कहते हैं (जैसे: कब + ही = कभी, तब + ही = तभी)। हालाँकि, हिंदी व्याकरण में विस्तार से जिन संधियों को पढ़ाया जाता है, वे अधिकतर संस्कृत (तत्सम) शब्दों पर आधारित होती हैं क्योंकि हिंदी का आधार संस्कृत ही है।

प्रश्न 15: स्वर संधि के पाँचों भेदों को याद रखने की कोई सरल विधि बताइए।

उत्तर: स्वर संधि को पहचानने की ट्रिक:
1. दीर्घ: बड़ी मात्रा (आ, ई, ऊ)।
2. गुण: एक मात्रा (ए, ओ)।
3. वृद्धि: दो मात्राएं (ऐ, औ)।
4. यण: य, व, र से पहले आधा अक्षर।
5. अयादि: अय, आय, अव, आव का उच्चारण और प्रायः तीन अक्षरों वाले शब्द।


अध्याय 2: वर्ण विचार





अध्याय 2: वर्ण विचार (Phonology) – संपूर्ण अध्ययन

हिंदी व्याकरण के प्रथम अंग को ‘वर्ण विचार’ कहा जाता है। किसी भी भाषा को सीखने के लिए उसकी मूल ध्वनियों को समझना अनिवार्य है। वर्ण विचार के अंतर्गत हम वर्णों के आकार, उनके उच्चारण, उनके भेद और उनके मेल से शब्द बनाने के नियमों का विस्तार से अध्ययन करते हैं।

1. वर्ण की परिभाषा और स्वरूप

भाषा की वह सबसे छोटी इकाई जिसके और अधिक टुकड़े या खंड नहीं किए जा सकते, उसे वर्ण कहते हैं। वर्ण को ‘अक्षर’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है जिसका क्षय (नाश) न हो।

उदाहरण:
‘आम’ शब्द दो वर्णों के मेल से बना है: आ + म् + अ।
यहाँ ‘आ’, ‘म्’ और ‘अ’ वर्ण हैं क्योंकि इनके और अधिक छोटे हिस्से नहीं हो सकते।

2. वर्णमाला (Alphabet)

किसी भी भाषा के वर्णों के व्यवस्थित और क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी वर्णमाला देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसमें कुल 52 वर्ण होते हैं (मानक गणना के अनुसार)।

3. वर्ण के भेद

उच्चारण और प्रकृति के आधार पर हिंदी वर्णमाला को दो मुख्य भागों में बांटा गया है:

(क) स्वर (Vowels)

जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के स्वतंत्र रूप से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। हिंदी में मुख्य रूप से 11 स्वर होते हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।

स्वरों के प्रकार:

  • ह्रस्व स्वर: जिनके उच्चारण में बहुत कम समय लगता है (अ, इ, उ, ऋ)।
  • दीर्घ स्वर: जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दुगुना समय लगता है (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ)।
  • प्लुत स्वर: जिनके उच्चारण में तीन गुना समय लगे, जैसे ‘ओ३म’।

(ख) व्यंजन (Consonants)

जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक व्यंजन में ‘अ’ की ध्वनि छिपी होती है।

व्यंजनों का वर्गीकरण:

  1. स्पर्श व्यंजन: क-वर्ग से म-वर्ग तक (कुल 25 व्यंजन)।
  2. अंतस्थ व्यंजन: य, र, ल, व (कुल 4 व्यंजन)।
  3. ऊष्म व्यंजन: श, ष, स, ह (कुल 4 व्यंजन)।
  4. संयुक्त व्यंजन: क्ष, त्र, ज्ञ, श्र (दो व्यंजनों के मेल से बने)।
अयोगवाह: ‘अं’ (अनुस्वार) और ‘अः’ (विसर्ग) को न तो पूर्णतः स्वर माना जाता है और न ही व्यंजन, इसलिए इन्हें अयोगवाह कहते हैं।

4. उच्चारण स्थान (Place of Articulation)

मुख के जिस भाग से जो वर्ण बोला जाता है, वह उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहलाता है। इसे समझना शुद्ध वर्तनी के लिए अत्यंत आवश्यक है।

वर्ग उच्चारण स्थान वर्ण
कंठ्य गला (कंठ) अ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह
तालव्य तालु इ, ई, च, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धन्य मूर्धा (कठोर तालु) ऋ, ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष
दंत्य दांत त, थ, द, ध, न, ल, स
ओष्ठ्य होंठ उ, ऊ, प, फ, ब, भ, म

5. अल्पप्राण और महाप्राण

सांस की मात्रा (वायु) के आधार पर व्यंजनों के दो भेद हैं:

  • अल्पप्राण: जिनके उच्चारण में वायु कम मात्रा में बाहर निकलती है (वर्ग का 1, 3, 5वां वर्ण)।
  • महाप्राण: जिनके उच्चारण में वायु अधिक मात्रा में और ‘ह’ जैसी ध्वनि के साथ निकलती है (वर्ग का 2, 4वां वर्ण)।

6. घोष और अघोष वर्ण

स्वरतंत्रियों में कंपन के आधार पर:

  • अघोष: जिनके उच्चारण में कंपन नहीं होता (वर्ग का 1, 2वां वर्ण)।
  • सघोष (घोष): जिनके उच्चारण में कंपन होता है (वर्ग का 3, 4, 5वां वर्ण और सभी स्वर)।

महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (अभ्यास कार्य)

प्रश्न 1: ‘वर्ण’ और ‘अक्षर’ में सूक्ष्म अंतर क्या है? उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सामान्य बोलचाल में वर्ण और अक्षर को एक ही माना जाता है, परंतु व्याकरणिक दृष्टि से इनमें सूक्ष्म अंतर है। ‘वर्ण’ भाषा की वह मूल ध्वनि है जिसके टुकड़े नहीं हो सकते (जैसे- क्, म्, अ, इ)। ‘अक्षर’ वह ध्वनि या ध्वनि समूह है जिसका उच्चारण श्वास के एक झटके में हो जाता है। उदाहरण के लिए, ‘राम’ शब्द में वर्ण चार हैं (र + आ + म + अ), लेकिन अक्षर दो ही हैं (रा + म)। अक्षर में स्वर का होना अनिवार्य है, जबकि वर्ण स्वर-रहित भी हो सकता है।

प्रश्न 2: संयुक्त व्यंजन किसे कहते हैं? हिंदी वर्णमाला के चारों संयुक्त व्यंजनों का निर्माण प्रक्रिया बताइए।

उत्तर: जब दो अलग-अलग व्यंजन आपस में मिलते हैं और एक नया रूप धारण कर लेते हैं, तो उन्हें संयुक्त व्यंजन कहा जाता है। हिंदी में मुख्य चार संयुक्त व्यंजन हैं:
1. क्ष: क् + ष + अ (उदाहरण: कक्षा, क्षमा)
2. त्र: त् + र + अ (उदाहरण: पत्र, त्रिशूल)
3. ज्ञ: ज् + ञ + अ (उदाहरण: ज्ञान, विज्ञान)
4. श्र: श् + र + अ (उदाहरण: श्री, श्रम)

प्रश्न 3: अनुस्वार (ं) और अनुनासिक (ँ) के प्रयोग के नियमों में क्या अंतर है?

उत्तर: अनुस्वार का उच्चारण केवल नाक से होता है और यह वर्ण के ऊपर बिंदु के रूप में लगाया जाता है (जैसे: गंगा, चंचल)। यह पंचम वर्ण के स्थान पर आता है। अनुनासिक (चंद्रबिंदु) का उच्चारण नाक और मुख दोनों से होता है (जैसे: चाँद, आँख, गाँव)। यदि शिरोरेखा के ऊपर मात्रा लगी हो, तो स्थान की कमी के कारण चंद्रबिंदु की जगह बिंदु लगाया जाता है, लेकिन उसका उच्चारण अनुनासिक ही रहता है (जैसे: में, कहीं)।

प्रश्न 4: ‘ऋ’ स्वर है या व्यंजन? वर्तमान समय में इसके उच्चारण की क्या स्थिति है?

उत्तर: ‘ऋ’ मूलतः संस्कृत का स्वर है और हिंदी वर्णमाला में इसे स्वरों की श्रेणी में ही रखा गया है। इसका प्रयोग केवल तत्सम (संस्कृत से आए) शब्दों में होता है जैसे- ऋषि, ऋतु, ऋण। आधुनिक हिंदी में इसका उच्चारण ‘रि’ (व्यंजन र + स्वर इ) की तरह होने लगा है, इसी कारण कई लोग इसे व्यंजन समझने की भूल करते हैं, परंतु व्याकरणिक रूप से यह आज भी स्वर है।

प्रश्न 5: स्पर्श व्यंजन किसे कहते हैं और इन्हें कितने वर्गों में बांटा गया है?

उत्तर: जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय जीभ मुख के विभिन्न भागों (कंठ, तालु, मूर्धा, दांत, ओष्ठ) को स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। इन्हें 5 वर्गों में बांटा गया है:
1. क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ)
2. च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ)
3. ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण)
4. त-वर्ग (त, थ, d, ध, न)
5. प-वर्ग (प, फ, ब, भ, म)

प्रश्न 6: द्वित्व व्यंजन से आप क्या समझते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।

उत्तर: जब एक ही व्यंजन ध्वनि दो बार लगातार आए (एक बार स्वर रहित और दूसरी बार स्वर सहित), तो उसे द्वित्व व्यंजन कहते हैं। इसमें पहला व्यंजन आधा और दूसरा पूरा होता है।
उदाहरण:
– क् + क = क्क (पक्का, चक्का)
– च् + च = च्च (बच्चा, कच्चा)
– ट् + ट = ट्ट (खट्टा, लट्टू)
– ल् + ल = ल्ल (बिल्ली, दिल्ली)

प्रश्न 7: अंतस्थ और ऊष्म व्यंजनों के बीच के अंतर को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: अंतस्थ व्यंजन (य, र, ल, व): इनके उच्चारण में जीभ मुख के किसी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती। ये स्वर और व्यंजन के मध्य की स्थिति में होते हैं।
ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह): इनके उच्चारण में मुख से वायु रगड़ खाकर निकलती है जिससे ऊष्मा (गर्मी) पैदा होती है। इन्हें बोलते समय एक प्रकार की सीटी जैसी ध्वनि या घर्षण महसूस होता है।

प्रश्न 8: वर्ण विच्छेद (Word Analysis) किसे कहते हैं? ‘प्रशिक्षण’ शब्द का वर्ण विच्छेद कीजिए।

उत्तर: किसी शब्द के प्रत्येक वर्ण को अलग-अलग करके लिखना ‘वर्ण विच्छेद’ कहलाता है। इससे शब्द की बनावट और वर्तनी का सही ज्ञान होता है।
प्रशिक्षण: प् + र + अ + श् + इ + क् + ष + अ + ण + अ।

प्रश्न 9: ‘ड़’ और ‘ढ़’ ध्वनियों की क्या विशेषता है? ये मूल व्यंजनों से कैसे अलग हैं?

उत्तर: ‘ड़’ और ‘ढ़’ को उत्क्षिप्त या विकसित व्यंजन कहा जाता है। ये ट-वर्ग के ‘ड’ और ‘ढ’ के नीचे बिंदु (नुक्ता) लगाकर बनाए गए हैं। इनकी मुख्य विशेषता यह है कि इनसे कभी भी किसी शब्द की शुरुआत नहीं होती। ये हमेशा शब्द के बीच में या अंत में आते हैं (जैसे: सड़क, पढ़ना, चढ़ना)। जबकि ‘ड’ और ‘ढ’ से शब्द शुरू हो सकते हैं (जैसे: डमरू, ढोलक)।

प्रश्न 10: स्वर तंत्रियों के आधार पर घोष और अघोष वर्णों का वर्गीकरण विस्तार से समझाइए।

उत्तर: अघोष वर्ण: प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण (क, ख, च, छ…) तथा श, ष, स अघोष हैं। इनके उच्चारण में गूँज पैदा नहीं होती।
घोष/सघोष वर्ण: प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पांचवां वर्ण (ग, घ, ङ, ज, झ, ञ…) तथा सभी स्वर, य, र, ल, व, ह घोष हैं। इनके उच्चारण में स्वर तंत्रियों में कंपन और गूँज उत्पन्न होती है।

प्रश्न 11: हलंत (्) का प्रयोग कब और क्यों किया जाता है?

उत्तर: जब किसी व्यंजन का प्रयोग स्वर के बिना करना हो, तो उसके नीचे एक तिरछी रेखा लगाई जाती है जिसे हलंत कहते हैं। व्यंजन अपने आप में अधूरे होते हैं, उन्हें बोलने के लिए ‘अ’ स्वर की आवश्यकता होती है। यदि हम केवल शुद्ध व्यंजन दिखाना चाहते हैं, तो हलंत का प्रयोग अनिवार्य है (जैसे: महान्, विद्वान्, पाठ्य)।

प्रश्न 12: विसर्ग (ः) का उच्चारण किस प्रकार किया जाता है? इसका प्रयोग किन शब्दों में होता है?

उत्तर: विसर्ग का उच्चारण स्वर के बाद आधे ‘ह’ की तरह किया जाता है। इसका चिन्ह (ः) है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से संस्कृत के तत्सम शब्दों में होता है। उदाहरण: प्रातः (प्रात-ह), अतः (अत-ह), स्वतः, दुःख आदि। हिंदी की तद्भव शब्दावली में विसर्ग का लोप हो जाता है।

प्रश्न 13: स्वर की मात्राओं से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: जब स्वरों का प्रयोग व्यंजनों के साथ मिलाकर किया जाता है, तो उनका रूप बदल जाता है। स्वरों के इसी बदले हुए रूप को ‘मात्रा’ कहते हैं। ‘अ’ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती, वह प्रत्येक व्यंजन में समाहित होता है। अन्य स्वरों (आ, इ, ई आदि) के लिए निश्चित चिन्ह हैं। जैसे- क + आ = का, क + इ = कि।

प्रश्न 14: वर्णमाला में ‘अयोगवाह’ का स्थान कहाँ है?

उत्तर: अयोगवाह (अनुस्वार और विसर्ग) को वर्णमाला में स्वरों के ठीक बाद और व्यंजनों से ठीक पहले रखा जाता है। चूँकि इनका उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना संभव नहीं है, इसलिए ये व्यंजनों के निकट हैं, परंतु इनके चिन्ह स्वरों की तरह मात्राओं के रूप में लगते हैं, इसलिए ये स्वरों के साथ रखे जाते हैं।

प्रश्न 15: वर्ण विचार का अध्ययन व्याकरण में क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: वर्ण विचार व्याकरण की नींव है। यदि हमें वर्णों के शुद्ध उच्चारण और लेखन का ज्ञान नहीं होगा, तो हम शब्दों की वर्तनी (Spelling) में गलतियाँ करेंगे। गलत वर्तनी से शब्द का अर्थ बदल जाता है, जिससे पूरा वाक्य अशुद्ध हो जाता है। अतः भाषा की शुद्धता और स्पष्टता बनाए रखने के लिए वर्ण विचार का गहन अध्ययन अनिवार्य है।


अध्याय 1: भाषा, लिपि और व्याकरण






अध्याय 1: भाषा, लिपि और व्याकरण – पूर्ण परिचय


अध्याय 1: भाषा, लिपि और व्याकरण – पूर्ण परिचय

1. भाषा (Language) का विस्तृत विवरण

मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है। उसके मन में विचार निरंतर जन्म लेते रहते हैं। उन विचारों को व्यक्त करने के लिए जिस माध्यम का सहारा लिया जाता है, उसे ही ‘भाषा’ कहते हैं। संस्कृत की ‘भाष’ धातु से इसकी उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ है ‘बोलना’।

भाषा की परिभाषा

भाषा वह सार्थक ध्वनि-समूह है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और संवेगों का आदान-प्रदान करता है। यह केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, परंतु व्याकरणिक दृष्टि से हम केवल मानव-भाषा का अध्ययन करते हैं क्योंकि यह सुव्यवस्थित और तर्कपूर्ण होती है।

उदाहरण:

  • कक्षा में अध्यापक छात्रों को पढ़ा रहे हैं।
  • एक लेखक पुस्तक लिख रहा है।
  • दो मित्र फोन पर बात कर रहे हैं।

भाषा के मुख्य रूप

(क) मौखिक भाषा: जब हम बोलकर अपनी बात दूसरों तक पहुँचाते हैं। यह भाषा का अस्थायी रूप है।

(ख) लिखित भाषा: जब हम लिखकर अपने विचार व्यक्त करते हैं। यह भाषा का स्थायी रूप है।

(ग) सांकेतिक भाषा: जब संकेतों या इशारों से बात समझाई जाए।

2. लिपि (Script)

ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें ‘लिपि’ कहते हैं।

भाषा लिपि विशेषता
हिंदी, संस्कृत, मराठी देवनागरी वैज्ञानिक और स्पष्ट लिपि।
अंग्रेजी रोमन बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।
उर्दू फारसी दाएँ से बाएँ लिखी जाती है।
पंजाबी गुरुमुखी विशेष वर्ण व्यवस्था।

3. व्याकरण (Grammar)

व्याकरण वह शास्त्र है जो हमें भाषा को शुद्ध रूप में बोलना, पढ़ना और लिखना सिखाता है। इसके चार मुख्य अंग हैं: वर्ण विचार, शब्द विचार, पद विचार और वाक्य विचार।

अभ्यास प्रश्नावली (15 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर)

प्रश्न 1: भाषा और बोली में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है और इसका अपना व्याकरण होता है, जबकि बोली एक सीमित क्षेत्र में बोली जाती है और इसका व्याकरण निश्चित नहीं होता।

प्रश्न 2: देवनागरी लिपि की क्या विशेषता है?
उत्तर: यह विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपि है; इसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है।

प्रश्न 3: व्याकरण के बिना भाषा कैसी होती है?
उत्तर: व्याकरण के बिना भाषा अशुद्ध और अव्यवस्थित होती है, जिससे अर्थ का अनर्थ हो सकता है।

प्रश्न 4: लिखित भाषा का महत्व क्या है?
उत्तर: लिखित भाषा ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का एकमात्र साधन है।

प्रश्न 5: भारत के संविधान में कितनी भाषाओं को मान्यता दी गई है?
उत्तर: भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है।

प्रश्न 6: राजभाषा और राष्ट्रभाषा में क्या अंतर है?
उत्तर: राजभाषा सरकारी काम-काज की भाषा है, जबकि राष्ट्रभाषा पूरे देश की संपर्क भाषा होती है।

प्रश्न 7: व्याकरण के ‘पद विचार’ में क्या पढ़ाया जाता है?
उत्तर: इसमें शब्दों के वाक्य में प्रयोग होने के बाद उनके रूप परिवर्तन (संज्ञा, सर्वनाम आदि) का अध्ययन होता है।

प्रश्न 8: मातृभाषा का क्या अर्थ है?
उत्तर: वह भाषा जो बच्चा सबसे पहले अपनी माँ और परिवार से सीखता है।

प्रश्न 9: लिपि का विकास क्यों हुआ?
उत्तर: विचारों को स्थायित्व देने और दूर बैठे व्यक्तियों तक संदेश पहुँचाने के लिए लिपि का विकास हुआ।

प्रश्न 10: साहित्य के दो प्रकार कौन से हैं?
उत्तर: गद्य साहित्य (कहानी, निबंध) और पद्य साहित्य (कविता, दोहे)।

प्रश्न 11: मानक भाषा किसे कहते हैं?
उत्तर: भाषा के जिस रूप को विद्वानों द्वारा शुद्ध और सर्वमान्य माना जाता है, उसे मानक भाषा कहते हैं।

प्रश्न 12: हिंदी दिवस कब मनाया जाता है?
उत्तर: प्रतिवर्ष 14 सितंबर को।

प्रश्न 13: वाक्य विचार में हम क्या सीखते हैं?
उत्तर: इसमें वाक्यों की रचना, प्रकार और विराम चिह्नों के सही प्रयोग का अध्ययन होता है।

प्रश्न 14: क्या संस्कृत और हिंदी की लिपि एक ही है?
उत्तर: हाँ, दोनों देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।

प्रश्न 15: बोली का क्षेत्र कैसा होता है?
उत्तर: बोली का क्षेत्र अत्यंत सीमित और स्थानीय होता है।

अध्याय 1: भाषा, लिपि और व्याकरण – हिंदी व्याकरण नोट्स